मनरेगा में मजदूरी भुगतान और न्यूनतम वेतन से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2015 की जनहित याचिका का निपटारा कर दिया, लेकिन नए रोजगार कानून को चुनौती देने का रास्ता खोल दिया।
सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली: मनरेगा के तहत मजदूरों को समय पर मजदूरी और न्यूनतम वेतन मिलने से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने 2015 में दायर जनहित याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि इसमें उठाए गए मुद्दे पहले के ‘स्वराज अभियान’ मामले में दिए गए फैसले के दायरे में आते हैं। हालांकि, नए ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025’ के प्रावधानों को लेकर याचिकाकर्ताओं को नई याचिका दाखिल करने की स्वतंत्रता दी गई है।
देर से मजदूरी और न्यूनतम वेतन पर उठे थे सवाल
लाइव लॉ की खबर के मुताबिक, 2015 की जनहित याचिका में मुख्य रूप से दो मुद्दे उठाए गए थे। पहला, मनरेगा के तहत मजदूरी के भुगतान में देरी होने पर मजदूरों को मुआवजा दिया जाना चाहिए या नहीं।
दूसरा, मनरेगा के तहत निर्धारित न्यूनतम मजदूरी के बजाय राज्यों द्वारा अधिसूचित न्यूनतम मजदूरी दिए जाने का सवाल था। सुनवाई के दौरान अदालत ने ध्यान दिलाया कि अब पुराने मनरेगा कानून की जगह नया कानून लागू हो चुका है, इसलिए मौजूदा याचिका के जरिए नए कानून की वैधता या प्रावधानों की व्यापक जांच करना उचित नहीं होगा।
नए कानून को लेकर उठाया न्यूनतम मजदूरी का मुद्दा
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि न्यूनतम मजदूरी का सवाल नए कानून के तहत भी प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि ‘स्वराज अभियान’ मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह मान चुका है कि मजदूरों को राज्यों द्वारा अधिसूचित न्यूनतम मजदूरी दी जानी चाहिए, लेकिन इसका पूरी तरह पालन नहीं हुआ। भूषण ने यह भी कहा कि नए कानून में ‘फ्लोर मिनिमम वेज’ अधिसूचित करने की व्यवस्था है और यह मनरेगा के तहत मिलने वाली मजदूरी से कम नहीं हो सकती। उन्होंने दावा किया कि नए कानून के तहत करीब 300 रुपये का भुगतान किया जा रहा है।
‘काम का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं’
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने काम के अधिकार की संवैधानिक स्थिति पर अहम सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि संविधान के तहत काम का अधिकार कोई मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों के तहत एक लोकतांत्रिक आकांक्षा है। उन्होंने सवाल किया कि क्या राज्य द्वारा सामाजिक कल्याण के लिए तय मुआवजा स्तर को मौलिक अधिकार की तरह लागू किया जा सकता है। न्यायमूर्ति बागची ने यह भी पूछा कि यदि अदालत ऐसा आदेश देती है और राज्य अपनी सामाजिक कल्याण योजनाओं को सीमित कर देता है, तो क्या अदालत आदेश जारी कर किसी सरकार को मनरेगा या नए कानून को उसी तरह लागू करने के लिए बाध्य कर सकती है।
न्यूनतम वेतन और सम्मानजनक जीवन का तर्क
प्रशांत भूषण ने इसके जवाब में कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सम्मानजनक जीवन को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत अधिकार का हिस्सा माना है। उनके मुताबिक, यदि किसी व्यक्ति को काम दिया जाता है तो सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने के लिए उसे कम से कम न्यूनतम मजदूरी मिलनी चाहिए। भूषण ने इसी आधार पर अदालत से नए कानून के तहत न्यूनतम मजदूरी से जुड़े प्रावधानों की जांच करने का आग्रह किया। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि मौजूदा जनहित याचिका के दायरे में नए कानून के प्रावधानों की जांच नहीं की जा सकती।
सीजेआई ने मनरेगा की भूमिका को सराहा
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने मनरेगा की ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि ग्रामीण इलाकों में हजारों-लाखों ऐसे लोग थे, जिनके पास आजीविका का कोई साधन नहीं था और मनरेगा ने उन्हें काम करके सम्मानजनक तरीके से कमाने का अवसर दिया। सीजेआई ने इसे व्यापक प्रभाव वाली एक प्रभावी कल्याणकारी योजना बताते हुए कहा कि यह मुफ्त चीजें बांटने वाली योजना नहीं थी और न ही इसे शोषण की योजना कहा जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी पीड़ित व्यक्ति के सामने आए बिना जनहित याचिका में उठाए गए मुद्दे की जांच करना कठिन हो सकता है।
नई याचिका आई तो जांच करेगा सुप्रीम कोर्ट
जब प्रशांत भूषण ने नए कानून के प्रावधानों की जांच की मांग दोहराई, तो पीठ ने मौजूदा मामले में ऐसा करने से इनकार कर दिया। सीजेआई ने स्पष्ट किया कि यदि नए कानून के प्रावधानों को चुनौती देने वाली कोई नई याचिका दायर की जाती है, तो अदालत उस पर निश्चित रूप से विचार करेगी। इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने 2015 की जनहित याचिका का निपटारा कर दिया, लेकिन नए रोजगार कानून के तहत न्यूनतम मजदूरी, रोजगार के दायरे और अन्य प्रावधानों को चुनौती देने का रास्ता खुला रखा है।
लेखक के बारे मेंअशोक उपाध्यायअशोक उपाध्याय, नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में सीनियर डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर हैं। फील्ड रिपोर्टिंग और डेस्क पर काम करने का 12 साल का अनुभव। साल 2014 में नवभारत टाइम्स हिंदी अखबार से पत्रकारिता के सफर की शुरुआत की थी। पॉलिटिक्स और क्राइम बीट पर रिपोर्टिंग का काफी अनुभव है। अमर उजाला देहरादून में भी सेंट्रल डेस्क पर काम किया है। साथ ही कई चुनावों में ग्राउंड रिपोर्टिंग की है। पिछले 6 साल से NBT डिजिटल में न्यूज डेस्क पर काम कर रहे हैं। गूगल ट्रेंड्स को पकड़ने की अच्छी समझ है।
विशेषज्ञता- राजनीति, क्राइम की खबरों पर अच्छी पकड़ के साथ करंट अफेयर्स और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अच्छा खासा अनुभव है। करंट टॉपिक पर विश्लेषण और ओपिनियन लिखने में खास रुचि है।
पत्रकारिता अनुभव: प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 12 साल से कार्यरत हैं।
JIMMC नोएडा से साल 2013 में पत्रकारिता की पढ़ाई की है। इससे पहले साल 2010 में एमएमएच कॉलेज गाजियाबाद (सीसीएस यूनिवर्सिटी मेरठ) से राजनीतिक शास्त्र में मास्टर डिग्री हासिल की। लोक प्रशासन विषय पर खास पकड़ है। पत्रकारिता से पहले यूपीएससी और उत्तराखंड और यूपी पीसीएस एग्जाम की तैयारी के दौरान समाजशास्त्र, संविधान समेत कई विषयों का अध्ययन किया। संवेदनशील मुद्दों पर लिखने की खास कला है। महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर कई मार्मिक लेख लिखे हैं। ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए लोगों की समस्याओं के समाधान का प्रयास किया है, कई बार सफलता भी मिली है। पत्रकारिता में आगे और बेहतर सीखने और समझने का क्रम जारी है।... और पढ़ें
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